घरघोड़ा में मुर्दों की लकड़ी पर भी व्यवस्था का ‘ग्रहण’!

सूखी लकड़ी बचाने बना शेड बना पार्किंग का अड्डा, बारिश में भीग रही अंतिम संस्कार की लकड़ियां - जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

घरघोड़ा :- किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी जुटाना परिवार के लिए सबसे जरूरी व्यवस्थाओं में से एक होता है। इसी मानवीय जरूरत को ध्यान में रखते हुए घरघोड़ा में दाह संस्कार के लिए सूखी लकड़ी सुरक्षित रखने के उद्देश्य से शेड का निर्माण कराया गया था, ताकि बारिश के मौसम में भी जरूरतमंद परिवारों को अंतिम संस्कार के लिए सूखी लकड़ी उपलब्ध हो सके। लेकिन वर्तमान तस्वीरें इस पूरी व्यवस्था की बदहाल स्थिति की कहानी बयां कर रही हैं।

जिस शेड में सूखी लकड़ी सुरक्षित रहनी चाहिए थी, वहां वाहन खड़ा है और जिस लकड़ी को शेड के भीतर सुरक्षित रखा जाना था, वह बाहर बारिश और नमी की मार झेल रही है। सवाल यह है कि आखिर सार्वजनिक सुविधा के लिए बनाए गए इस शेड का उपयोग किसके लिए किया जा रहा है?

    जिस शेड में लकड़ी होनी थी, वहां खड़ी है कार!

मौके की तस्वीरों में साफ दिखाई दे रहा है कि शेड के भीतर एक कार पार्क की गई है। दूसरी ओर दाह संस्कार के लिए उपयोग होने वाली लकड़ियों के सुरक्षित रख-रखाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

यह महज पार्किंग का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था का सवाल है जो किसी परिवार को उसके सबसे दुखद समय में तत्काल राहत देने के उद्देश्य से बनाई गई थी।

जब किसी घर में मौत होती है तो परिवार पहले ही मानसिक और भावनात्मक पीड़ा से गुजर रहा होता है। ऐसे समय में यदि अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी की व्यवस्था भी ठीक से न हो, तो जिम्मेदार व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।

बारिश में गीली हो रही लकड़ी, फिर किस काम की व्यवस्था?

शेड का मूल उद्देश्य ही लकड़ी को बारिश से बचाकर सूखा और उपयोग योग्य बनाए रखना था। लेकिन यदि लकड़ी खुले में पड़ी रहे और शेड का उपयोग वाहन खड़ा करने के लिए होने लगे तो इस व्यवस्था के औचित्य पर ही सवाल खड़ा होता है।

क्या जिम्मेदारों ने कभी मौके पर जाकर देखा कि लकड़ी किस हालत में रखी गई है?

क्या यह देखा गया कि शेड का उपयोग अपने निर्धारित उद्देश्य के अनुसार हो रहा है या नहीं?

क्या किसी अधिकारी ने यह सुनिश्चित किया कि अंतिम संस्कार के समय जरूरतमंद परिवार को सूखी लकड़ी मिल सके? इन सवालों के जवाब अब सार्वजनिक होने चाहिए।

‘जनसुविधा’ के नाम पर निर्माण, लेकिन सुविधा गायब!

सरकारी अथवा सार्वजनिक धन से किसी सुविधा का निर्माण केवल भवन या शेड खड़ा करने के लिए नहीं किया जाता। उसका वास्तविक उद्देश्य लोगों को सुविधा उपलब्ध कराना होता है। यदि निर्माण के बाद उसके रख-रखाव और उपयोग पर ही ध्यान नहीं दिया जाए तो सरकारी खर्च का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है।

घरघोड़ा में दाह संस्कार के लिए लकड़ी रखने की व्यवस्था भी इसी सवाल के बीच खड़ी नजर आ रही है।

शेड मौजूद है, लेकिन लकड़ी सुरक्षित नहीं। व्यवस्था मौजूद है, लेकिन उपयोग सही नहीं। संसाधन मौजूद है, लेकिन जरूरत के समय उसका लाभ मिलेगा या नहीं - इस पर सवाल है।

जिम्मेदारों की चुप्पी पर भी सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरी स्थिति की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यदि शेड का उपयोग पार्किंग के लिए किया जा रहा है तो क्या संबंधित विभाग अथवा स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है? और यदि जानकारी है तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

नगरवासियों का कहना है कि अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील और आवश्यक व्यवस्था को किसी भी हालत में लापरवाही का शिकार नहीं होने दिया जाना चाहिए। शेड को तत्काल खाली कराकर उसमें दाह संस्कार के लिए पर्याप्त मात्रा में सूखी लकड़ी व्यवस्थित तरीके से रखने, बारिश से बचाव की व्यवस्था करने और नियमित निगरानी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। 

अब तस्वीरें सवाल पूछ रही हैं, जवाब जिम्मेदारों को देना होगा मामला किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाने का नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था को उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप संचालित कराने का है। यदि यह शेड वास्तव में मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बनाया गया है, तो फिर इसकी वर्तमान स्थिति की जांच होना जरूरी है।

घरघोड़ा के जिम्मेदार अधिकारी मौके का निरीक्षण करें, शेड के निर्माण और उपयोग की जानकारी सार्वजनिक करें तथा यह सुनिश्चित करें कि अंतिम संस्कार के लिए आने वाले किसी भी परिवार को लकड़ी के लिए भटकना न पड़े।

क्योंकि मौत के बाद आखिरी विदाई में भी अगर व्यवस्था लकड़ी नहीं बचा पाए, तो फिर ऐसी व्यवस्था आखिर किस काम की? अब जरूरत है फोटो देखकर आंखें बंद करने की नहीं, बल्कि मौके पर पहुंचकर व्यवस्था को दुरुस्त करने की। 

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