घरघोड़ा :- 


“जहां आस्था का जल बहता था, वहां अब सड़ांध और चुप्पी तैर रही है।”

घरघोड़ा की पहचान और धार्मिक जीवन का केंद्र रहा बागमुड़ा तालाब आज बर्बादी की कगार पर है। यह वही पवित्र तालाब है जहां से नवरात्रि की कलश यात्रा आरंभ होती है, जहां गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता है, जहां श्रद्धा के दीप जलते थे। लेकिन आज वहां केवल जलकुंभी की हरियाली में छुपा सन्नाटा है।


तालाब नहीं, अब गंदगी का दलदल बनता जा रहा है

पूरे तालाब में जलकुंभी का साम्राज्य स्थापित हो चुका है। पानी की सतह तक दिखना मुश्किल है। इससे न केवल धार्मिक क्रियाएं बाधित हो रही हैं, बल्कि तालाब की जल-परिसंचरण प्रणाली ठप हो गई है, और मच्छरों, बीमारियों व गंध ने इलाके को घेर लिया है।


             प्रशासन की बेरुखी या उदासीनता?

स्थानीय नागरिकों द्वारा बार-बार सफाई की मांग के बावजूद नगर पंचायत घरघोड़ा ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इस चुप्पी से लोगों में आक्रोश फैल रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो नगर पंचायत को ना तो जनभावनाओं की कद्र है, ना ही परंपराओं की अहमियत का कोई सम्मान।

 अब सवाल जनता का – क्या हमारी आस्था की इस धरोहर को ऐसे ही मरने दिया जाएगा?

 “बागमुड़ा तालाब केवल जल स्रोत नहीं, यह हमारी संस्कृति, परंपरा और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। अगर इसे आज नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल तस्वीरें ही मिलेंगी।” — एक स्थानीय नागरिक की भावुक प्रतिक्रिया।


                            जनहित में मांग

अविलंब जलकुंभी की सफाई

तालाब की वैज्ञानिक ढंग से पुनर्जीवितीकरण

स्थायी निगरानी समिति का गठन

धार्मिक आयोजनों से पूर्व विशेष सफाई अभियान

अब यह सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि आंदोलन का विषय है — “बागमुड़ा तालाब को बचाओ, घरघोड़ा की आत्मा को जिलाओ!”

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